मनुष्य अपने आनंद का निर्माता स्वयं है। - थोरो
हर्ष के साथ शोक और भय इस प्रकार लगे हैं जैसे प्रकाश के संग छाया.
सच्चा सुखी वही है जिसकी दृष्टि में दोनों समान हैं. - धम्मपद
आनंद ही ब्रह्म है, आनंद से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं. उत्पन्न होने पर आनंद से ही जीवित रहते हैं और मृत्यु से आनंद में समा जाते हैं. - उपनिषद
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